समकालीन काव्यदृष्टि
पहचान के प्रयत्न में कठिनाईयाँ
नई
कविता को आज जो रूप और भावशिल्प मिला है वह उभरते मिटते काव्यांदोलनों के
टुकड़े प्रसवों का जोड़ भर दिखाई देता है. वह कोई विशिष्ट काव्यदृष्टि को
उपलब्ध कर सकी हो ऐसा नहीं दिखता. हिंदी कवियों की काव्य-दृष्टियों में एक
व्यापक बिखराव है. कविता के पूर्वलग्नों को आंदोलनों के माध्यम से
तोड़ने-मरोड़ने में इस बिखराव की इंगिति पाई जा सकती है. अभी वह बिखराव कम
होता दिखाई नहीं देता. मुझे लगता है कि इन बिखरावों ने हिंदी कविता के
क्षेत्र में किसी स्तरीय काव्यदृष्टि को विकसित नहीं होने दिया है. जो कुछ
विकसित हुआ है वह शायद दुराग्रही अहंदृष्टि है.
संभव है मेरी यह
प्रतीति गलत या अधूरी हो पर नई कविता में उद्बुद्ध काव्य- दृष्टियों की टोह
में निकलने पर प्रथम साक्षात्कार इस अहं से ही होता है. कवियों के कथन के
माध्यम से उनके मानस-क्षेत्र में प्रवेश करने पर वहोँ उनकी काव्यदृष्टि का
साक्षात्कार नहीं हो पाता.
मेरी नजर में कवि की काव्यदृष्टि उनके
आभ्यंतर से अभिसिंचित मानसिक यात्रा की वैचारिक परिणति होनी चाहिए, निश्चित
ही उसका कोई ओर-छोर होना चाहिए। मेरी दृष्टि में उसमें एक ऐतिहासिक
अंतर्धारा की विकसनशीलता भी होनी चाहिए। उसमें उसके सांवेगिक प्रवाहों का
दुस्साहस भी होना चाहिए, जो अस्तित्व की गतिशीलता को प्रभावित करता है,
संस्कृति के परिष्कारों को जीवन प्रदान करता है, जिसके अपने गहरे
अनुभव-साक्ष्य हों। कोई आवश्यक नहीं कि यह ऐतिहासिक अंतर्धारा रूढ़िगत हो।
मनुष्य के भौतिक अस्तित्व के विकास की तरह उसके समग्र अस्तित्व का विकास भी
किसी विकसनशीलता की परिणति हो सकता है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि मनुष्य
के भौतिक विकास के आंतरिक जगत में ठहराव आने पर अवरुद्धता को तोड़ने का
प्रयास हो सकता है, और अलग हटकर कोई नई विकास-कड़ी भी खड़ी की जा सकती है।
नई कविता के क्षेत्र में संभवतः नई विकास की कड़ी खड़ी करने की कोशिश की गई
है, परंपरा से विच्छिन्न होकर, पर वहाँ स्पष्ट काव्य-दृष्टि का होना
अपरिहार्य था। लेकिन वहाँ स्पष्ट काव्य-दृष्टि दिखाई नहीं पड़ती। जो दीखती
है वह काव्य-दृष्टयों के काट-पीट की अनगढ़ और सतही प्रयोगशीलता भर है। नई
कविता के पुरस्कर्ता तक अपने ही अनुभव-साक्ष्यों को बदलते संदर्भों के साथ
काटते नजर आते हैं। एक ही कवि के अनुभव संदर्भ उनकी कविताओं में विरोधाभास
उत्पन्न करते हैं। फलतः उनकी काव्य-दृष्टि धुँधली दिखाई पड़ती है। “नदी की
बाँक पर छाया” (अज्ञेय) नामक काव्य-संकलन में “उसके चेहरे का इतिहास” नामक
कविता से तो यही अहसास जगता है।
अज्ञेय एक प्रयोगधर्मी कवि रहे हैं।
“राहों का अन्वेषण” उनकी केंद्रीय काव्य-दृष्टि प्रतीत होती है, पर “उसके
चेहरे का इतिहास” जानने के लिए उन्होंने जिन राहों का अन्वेषण किया है अब
वही उन राहों को अस्वीकार कर रहे हैं। सप्तक के कवि गिरिजा कुमार माथुर भी
अपनी अन्वेषित राहों को छोड़ रहे हैं। कहने का तात्पर्य है कि नई कविता के
पुरोधा में टिकाव नहीं है। उनके साथियों में भी टिकाव का अभाव है। कदाचित
ऐसा इसलिए है कि उनके अनुभव-संदर्भ अपरिपक्व और जल्दबाजी के थे। उन्हें
जल्दी से व्यापक प्रतिष्ठा प्राप्त करनी थी। सामयिक बुद्धि-संदर्भ में
प्रतिभा के एक संस्कार को झकझोर कर प्रतिष्ठित होना तथा लोक में प्रसिद्धि
पाना आसान बात थी
(“मेरा उद्देश्य क्योंकि प्रभुत्व के एक संस्कार को झकझोरना था ओर वह एक अंश तक पूरा हो गया था,…मैंने तो इतना ही कहा था कि साहित्यकार को कुछ दूसरी तरह से भी सोच सकना चाहिए।“ –अज्ञेय, भाषा कला और औपन्यासिक मानस) संभवतः इसी जल्दबाजी के कारण कोइ निश्चित काव्यदृष्टि विकसित नहीं हो सकी।
नई
काव्य-दृष्टि के संदर्भ में सिर्फ एक बात स्पष्ट है। वह यह कि पुराने
कवियों के अननकूल नए कवियों ने जीवन के व्यापक परिवेश को कविता का विषय
बनाया। उनकी दृष्टि में जीवन का भौतिक फैलाव अधिक मुखर है. लेकिन बुद्धि की
अस्थिरता यहाँ हावी है। कविता तर्क के निष्कर्षों की बाँहों में आबद्ध है
जो तर्क के बदलने पर बदल जाते हैं। यहाँ किन्हीं निश्चयों के उद्घाटन का
अभाव है क्यों कि उसमें आभ्यंतर की समग्रता चाहिए। “उसके चेहरे का इतिहास”
जानने के क्रम में, जो इस समय लगभग सभी नए कवियों की नियति है (क्योंकि इस
प्रयास में स्वयं के चेहरे का इतिहास छिप जाता है) निष्कर्ष ही हाथ लग सकते
हैं, जिसमें स्थिरता नहीं हो सकती। अनुभव-साक्ष्यों के उथलेपन के कारण ये
ऊपर से बह उठेंगे और किन्हीं सुनिश्चित अर्थ-संस्कारों से गर्भित
काव्य-दृष्टि का उभरना कठिन होगा, और शायद यही हुआ है। कविताओं में कवियो
के उथले मानसिक प्रक्षेप प्रतिबिंबित हैं जिनके पीछे ‘मैं‘ के मूर्त प्रवेश
के बावजूद किन्हीं सुदीर्घ गहरे अनुभवों का अभाव है। कविताओं में उनके
द्वारा दिए अर्थ-संस्कारों में उनकी अस्पष्ट काव्य-दृष्टि का गुंथन ही हो
पाया है। ‘मैं’ की उपस्थिति से अनुभव की गहराई का अनुमान किया जा सकता था
पर ये अनुभव भी ‘मैं’ पर प्रक्षिप्त-से दिखते हैं।
नई कविता में
खोकर मैंने देखा है, वहाँ रूप-शिल्प का एक अराजक संसार विद्यमान है।
अभिव्यक्ति के संस्कारों में अनूठापन है पर यह सभी कुछ हमारी अस्मिता के
सीधे तालमेल में नहीं है। हमारी मानसिकता के अछूते प्रसंग वहाँ अवश्य हैं
पर हमारी मनोनिर्मिति उनसे एकरस नहीं हो पाती। वहाँ पारंपरिक प्रतिभा के
संस्कारों को झकझोर कर चौंका देने की प्रयोगशीलता अवश्य है पर उस
प्रयोगशीलता को अर्थ-संहति देने, उसके प्रतीकों, बिंबों में जातीय
प्रश्नों, अहसासों, अनुभवों तथा अर्थों को गहरी उद्रिक्ति देने का प्रयास
नहीं दिखता। कविता की निर्मिति, कवि की मनोनिर्मिति तथा पाठक की मनःस्थिति
के बीच कोई ऐसा स्वस्तिक-बिंदु नहीं दिखाई पड़ता, जहाँ से कविता के मर्मों
की टोह ली जा सके।
नई कविता के साक्षात्कार में सबसे बड़ी समस्या इस
अभिबिंदु से साक्षात्कार का ही है। आखिर कविता भी मानस के तल पर घुमड़ रहे
तमाम अराजक बिंदुओं का किसी एक बिंदु की संवेदनशीलता में घनीभूत होकर हृदय
के तल पर उद्रेक ही तो है। नई कविता में इस उद्रिक्ति-बिंदु का
साक्षात्कार ही एक जटिल समस्या है। इस उद्रिक्ति के पीछे भूमिका के रूप में
उपस्थित कवि की मनोनिर्मिति और उसके अंतर्बाह्य झुकावों को समझना अत्यंत
आवश्यक है। और इसी के लिए वक्तव्यों, अनुचिंतनों एवं संबंधित आलोचनाओं का
सहारा लेना पड़ता है, पर ये सब सामग्रियाँ भी इतनी अनगढ़ और उलझी हुई हैं
कि बहुत सहायता नहीं कर पातीं।
मेरे ऐसा सोचने का यह अर्थ कदापि
नहीं है कि मेरे मन में इन जलते बुझते काव्याँदोलनों का अनादर है। वल्कि ये
तमाम आंदोलन मेरी दृष्टि में नई काव्यानुभूतियों की घुमड़न हैं। हाँ इनकी
संदिग्ध स्थिति यह है कि ये घुमड़न उसी उद्रिक्ति-बिंदु की तलाश में हैं भी
यह कहना सरल नहीं है। यह भी कहना संदेहपूर्ण है कि ये कविताएँ कवि के विशद
अध्ययन, गहरी काव्यानुभूति और अनुभवों के बाद प्रतिफलित हुई है।
नई
कविता के पूर्व के काव्यांदोलनों से जन्मी कविताओं से सीधे साक्षात्कार
उतना कठिन नहीं है, क्योंकि उनकी मानसिकता तथा मनोनिर्मिति से साक्षात्कार
बहुत कठिन नहीं है। साथ ही नई कविता से अननुरूप उनके काव्योपकरण परिचित
हैं। अतः उनके बदले कथ्यों के मर्म उद्घाटित हो जाते हैं जबकि नई कविता के
काव्योपकरण एवं रूप-शिल्प अपरिचित तो हैं ही, उसमें प्राधान्य भी उन्हीं का
है, काव्य का बदलाव गौड़ हो गया है। रूप-शिल्प की इनकी प्रतीक-योजनाओं और
बिंब- योजनाओं में वह सुविचारित सटीकता नहीं है जो संदर्भों के बदलने पर भी
अर्थ-संप्रेषण में विफल नहीं होते। नई कविता के प्रतीक बदलते संदर्भों के
साथ धुँधलाते-से दीख पड़ते हैं।
आज आम आदमी के सामने जीवन के
संदर्भ गुणात्मक परिवर्तन के साथ उपस्थित है, आज का परिप्रेक्ष्य बदला है,
सोच-संदर्भ बदले हैं। जीवन मूल्यों की टकराहट में नयापन है, हमारे अहसासों
और प्रतीतियों में अंतरिक्ष का असीमित फैलाव मुखर है। पर इन सबके होने पर
भी कहने-सुननेवाले आदमी नए हो गए हैं, यह एकबारगी नहीं कहा जा सकता। कहने
वाले में अनुभव की समृद्धि अथवा सुननेवाले में बोध की गहराई पूरे अनुपात
में है यह भी नहीं कहा जा सकता है। कदाचित कुछ यही कारण है कि कविताओं से
सीधे साक्षात्कार का प्रयास कोई परिणाम नहीं खड़ा कर पाता। कविताओं में
अनुभव की समृद्धि के साथ बोध से भिंगोने की संवेदनशीलता का अभाव दिखता है।
यहीं पर एक और बात कहने का मैं साहस करना चाहता हूँ कि कविताओं में कवियों
के अनुभव हवा के थपेड़ों पर तिरते-से दिखाई देते हैं मानों उनमें वजन ही न
हो। एक कवि कुछ वर्षों पूर्व कुछ कह फिर आनेवाले वर्षों में अपने ही
अनुभव-साक्ष्य को काटता नजर आता है।
समकालीन काव्यदृष्टि को समझने
में तारसप्तकों की परंपरा भी कोई अहम भूमिका नहीं निभा पा रही है। मैं
सप्तकों की परंपरा को एक विशिष्ट काव्य-दृष्टि के विकास की कड़ी के रूप में
देखने का प्रयास कर रहा था क्योंकि उसके प्रस्तोताओं की विचार-परिधि में
मेरे हिसाब से कोई न कोई दृष्टिगत केंद्र जरूर रहना चाहिए था पर सप्तकों का
श्रीगणेश कैसे हुआ इस संदर्भ में नेमिचंद्र जैन की “बदलते परिप्रेक्ष्य”
पुस्तक देखने पर कुछ भिन्न ही तथ्य हाथ लगे। स्वयं सप्तकों की कविताओं में
ढूँढ़ने पर भी किसी सुनिश्चित काव्य-दृष्टि का विकास नहीं दिखाई देता।
हालाँकि जैसे दावे और फतवे किए गए थे किसी विशिष्ट काव्य-दृष्टि के बीजवपन
के वहाँ होने की कल्पना की जा सकती है जो आनुक्रमिक विकास को उपलब्ध होकर
प्रौढ़ता को प्राप्त कर सका हो। चौथे सप्तक में अज्ञेय ने इस बात का संकेत
भी दिया है कि नई कविता से संबंधित उनके प्रयास प्रतिष्ठित हो चुके हैं। पर
यह प्रयास क्या है—किसी काव्य-दृष्टि का विकास? पर कुल मिलाकर वहाँ भी एक
निराशा ही हाथ लगती है। और नई काव्य-दृष्टि को पहचानने के संबंध में
समस्याएँ अभी ज्यों की त्यों उलझी हुई हैं।