शेषनाथ प्रसाद
शिक्षा: बी. एस. सी., बीएड, एम.ए.
(हिंदी), बी. ए. (संस्कृत), सेवानिवृत्त हिन्दी प्रवक्ता।
प्रकाशित कृतियाँ- कविता संग्रह- अकेले की नाव अकेले की ओर इसके अतिरिक्त विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और वेब पर रचनाएँ प्रकाशित ईमेल- sheshnath250@gmail.com |
ईश्वरोक्ति
(एक कवि ने अपनी एक कविता में किसी मंदिर में प्रतिष्ठित देवप्रतिमा के पूजन में श्रद्धालुओं के सूनापन को देख ईश्वर को रोता हुआ चित्रित किया है। व्यक्ति-चेतना की इस दृष्टि को अपरिपक्व मानते हुए मैंने अधोलिखित कविता अपने दृष्टिकोण से लिखी है।) चिदात्मन्! तुम मेरे बारे में सोचते हो मेरी दुर्दशा से पीड़ित होते हो कुछ अद्भुत है यह पर तुम्हें जानना चाहिए मैं कोई स्थूल सत्य नहीं हूँ मैं सृजनशील सत्य हूँ और तुम इस सृजनशीलता की परिणति हो स्थूल शिलाओं में मेरी प्रतिष्ठा तो तुमने ने की है तिरुपति हो या शिरडी, या अन्य कहीं इनके एक एक कण में तुम्हारी ही आकांक्षाओं के अनुवाद टंकित हैं दृश्य या अदृश्य मेरे सर्वरूप का तुम्हें भान है हो भी क्यों न तुम्हारे जीव-द्रव्य के केंद्र में मेरी तरल विद्यमानता ने ही तुम्हें अंकुरित और तंत्रस्थ किया, अस्तित्व की सृजनशीलता के किसी क्षण में तुम्हें ‘मैं’ का उद्बोध हुआ और तुम मुझसे अलग अनुभव करने लगे मैं सभी मनु-पुत्रों में उनकी स्नायुओं की क्षमतानुसार शक्तिरूप सक्रिय हूँ मेरी सृजनशीलता के दरम्यान ही उन्हें उनकी इयत्ता मिली है यही उनका ‘मैं’ है यही तुम हो यही 'मैं' तुम्हारी व्यष्टि है इन्हीं व्यष्टियों में, कुछ ने अपनी वांक्षानुरूप मेरे रूप गढ़ लिए हैं और मेरे अनुभूतिगम्य रूप को वरद मान अपनी कामना को साधते हैं तुम वर्तमान की संवेदना से सने हो, अस्ति और नास्ति के तर्क में उलझे तुम्हें मेरे दुखी मन के आँसू दिखते हैं आँसुओं में ही तुम मेरा वास भी बताते हो तुम्हारी कल्पना इन आँसुओं को वैकुंठ में उड़ा देती है अपने गुजर-बसर के लिए मुझसे बहुत कुछ माँगते हो और प्रार्थना के फलित न होने पर जाने कितने व्यंग्य विद्रूप के मुझपर तीर चलाते हो पोथियों में तो मैं अब भी बेमानी हूँ, क्योंकि शब्दों के अंतराल को तुम पढ़ना भूल गए हो इसे पढ़ना तुम्हारे होने जैसा है होनी मेरे अस्तित्व को नहीं ललकारती होनी तुम्हारी क्षमता पर विहँसती है मेरा निधन निश्चित है तुम अभी सोचते हो, पश्चिमी तत्वदर्शी नीत्से तो मुझे कभी का मार चुका है (“ईश्वर मर गया है”) पर विडंबना देखो मैं हूँ कि अभी भी तुम्हारी स्नायुयों में धड़कता हूँ तुम्हारी उलाहना, आक्रोश और विरोध में अंतरस्थ मंत्रों से अनुप्राणित, और पत्थरों में प्रतिष्ठित मेरी कला-मुखर छवि की मूकता तुम्हारे भीतर कुछ तोड़ती है, इसी टूटने की अराजक ध्वनि तुम्हारे कानों को छलनी करती है, तुम्हारी अनियंत्रित जिजीविषा की और क्या गति हो सकती है अभी व्यस्तता के क्षणों में कुछ पल के लिए ही सही थोड़ा अपना तो हो लो सावन की फुहार सी तुम्हारी आन्तरिकता तुम पर बरस पड़ेगी तुम प्रकृति का आपूरण हो मैं तुम्हारे अस्तित्व का आधान हूँ तुम तथ्य हो, यथार्थ हो, जहाँ तुम्हारे पैर मचल पड़ें मैं हँसता दिखता हूँ जहाँ आहट भर रह जाए मैं रोता दिखने लगता हूँ और न जाने कितनी प्रक्षिप्तियाँ तुम मेरे चेहरे पर जड़ देते हो जीवन के संसरण की गति बहुत तेज है तेज चलो, अपनी अस्मिता को बरकरार रखे तालमेल बिठा के चलो तुम्हारी विश्लिष्ट अनुभूतियों ने अभी तुम्हें खण्डित ही किया है तुम्हार सामने क्षणिकाओं की दीप्ति है उसमें अभी अगर वे चूरा बन गईं तो वह अस्तित्व गोपन की कथा होगी
२३ मार्च
२०१५
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Sunday, 22 March 2015
ईश्वरोक्ति
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जीवन के गूढ़ रहस्य को बहुत ही सुन्दर सुघढ़ शिल्प से पिरोया है आपने
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